मैं यमुना हूँ।
मैं यमुना हूँ, सूर्य देव की पुत्री और यमराज की बहन। एक समय में देवताओं के जल से पवित्र, मानवता के लिए जीवनदायिनी। मेरे प्रवाह में कभी स्वच्छ जल बहता था, जिसमें देवताओं का वास था। रामायण और महाभारत के युग में मैं निर्मल थी, मेरे तटों पर ऋषि-मुनियों के आश्रम बसे थे, और मेरे जल से लोग आचमन कर पुण्य प्राप्त करते थे। किंतु आज जब मैं अपने प्रतिबिंब को देखती हूँ, तो स्वयं को पहचान नहीं पाती। मैं कहाँ खो गई? क्या मैं वही यमुना हूँ?
समय बदला, दुनिया बदली, और मेरा अस्तित्व भी बदल गया।
एक वो समय था जब गंगा की हीं तरह लोग मुझे भी पूजते थे , और मुझे युगी के नाम से जानते थे , न जाने कब मैं युगी से यमुना हुई और अब तो लोगों ने मुझे मृत मान भी लिया है और मुझे (dead river ) के नाम से बुलाने लगे हैं।
औद्योगीकरण ने मेरे जल को विषैला बना दिया, बढ़ती जनसंख्या ने मुझे कूड़े का ढेर बना दिया, और ग्लोबल वार्मिंग ने मेरी सांसे छीन लीं। मैं कराह रही हूँ, घुट रही हूँ, लेकिन कोई मेरी पीड़ा को सुनने वाला नहीं।
कितनी ही सरकारें आईं और गईं, हर किसी ने वादा किया कि मुझे फिर से स्वच्छ बनाएंगे, मुझे मेरा खोया सम्मान लौटाएंगे। बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनीं, भारी धनराशि खर्च हुई, लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात। मैं रोज़ आशा करती हूँ कि शायद कोई अपना वादा निभाएगा, पर हर बार ठगी जाती हूँ।
अब फिर से एक नई सरकार आई है, नए वादे किए गए हैं ,आरती का आयोजन हो रहा है, लोगों को उम्मीद दी जा रही है कि अब मैं स्वच्छ हो जाऊँगी। लेकिन क्या इस बार भी मैं सिर्फ एक चुनावी मुद्दा बनकर रह जाऊँगी? क्या मेरे आंसुओं का मोल कोई समझेगा, या फिर हर बार की तरह इस बार भी मुझे यूँ ही राजनीति की शिकार होना पड़ेगा?
मैं यमुना हूँ। क्या मैं कभी फिर से अपने पवित्र रूप में लौट पाऊँगी, या इस बार भी मैं ठगी जाऊँगी? क्या सच में मेरे निर्मल जल में फिर से जीवन संचार होगा, या मैं केवल वोट बैंक का एक साधन बनकर रह जाऊँगी? खैर ये तो समय ही बताएगा।